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रायगढ़।जिला जेल में दो मोबाइल फोन मिलने के बाद जेल की सुरक्षा व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। जेल जैसी हाई-सिक्योरिटी जगह के भीतर मोबाइल आखिर पहुंचा कैसे? किसने पहुंचाया? किस बंदी के लिए पहुंचाया गया? मोबाइल में लगी सिम किसके नाम पर है और उससे किन लोगों से संपर्क किया गया?

इन सवालों के जवाब अब जांच के केंद्र में हैं।
मामले ने उस समय और तूल पकड़ लिया, जब जेल के भीतर मोबाइल मिलने के साथ-साथ जेल की पिछली करीब 21 फीट ऊंची दीवार से प्रतिबंधित सामान फेंके जाने के कथित नेटवर्क की जानकारी भी सामने आने लगी। स्थानीय स्तर पर ‘टमाटर’ और ‘पारले बिस्किट’ जैसे संकेतों के जरिए बाहर मौजूद लोगों तक संदेश पहुंचाने और उसके बाद दीवार पार से सामान अंदर फेंके जाने की चर्चाएं हैंहालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी।

दो मोबाइल ने खोल दी जेल की सुरक्षा व्यवस्था की पोल?
जानकारी के मुताबिक जिला जेल में दो मोबाइलफोन बरामद हुए। इनमें से एक मोबाइल बैरक नंबर-7 और बैरक नंबर-8 के बीच मिलने की बात सामने आई है, जबकि दूसरा मोबाइल जेल

अस्पताल परिसर से बरामद होने की जानकारी है।
बैरक नंबर 7 और 8 में बड़ी संख्या में बंदी रहते हैं। ऐसे में सिर्फ मोबाइल बरामद होने से यह पता लगाना आसान नहीं है कि फोन किस बंदी के लिए अंदर आया था या उसका इस्तेमाल कौन कर रहा था।

दूसरी ओर अस्पताल से मोबाइल बरामद होना मामले को और गंभीर बनाता है, क्योंकि अस्पताल में उस समय भर्ती बंदियों के साथ-साथ वहां की ड्यूटी व्यवस्था और उस अवधि में हुई गतिविधियां भी जांच के दायरे में आ सकती हैं।
15 तारीख की रात और 12:30 बजे का सवाल
अब इस पूरे मामले में 15 तारीख की रात को लेकर भी कई सवाल उठ रहे हैं।
सूत्रों के हवाले से चर्चा है कि उस रात एक कैदी की तबीयत खराब होने के बाद उसे जेल अस्पताल में रखा गया था। इसी दौरान रात करीब 12:30 बजे मोबाइल से जुड़ी गतिविधियों को लेकर सवाल खड़े किए जा रहे हैं।

जैसे सामान कथित तौर पर संकेत के रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं।दावे के मुताबिक अंदर से संकेत मिलने के बाद बाहर से प्रतिबंधित सामान दीवार के ऊपर से जेल परिसर में फेंका जाता है।
क्या वास्तव में ऐसा कोई कोड चल रहा है?
क्या जेल की सीसीटीवी निगरानी के बावजूद यह संभव है?
क्या दीवार के पीछे की गतिविधियों की नियमित निगरानी होती है?
इन तमाम सवालों की जांच जरूरी है।
मोबाइल से लेकर गांजा और नशे का सामान पहुंचने का दावा
सूत्रों के अनुसार जेल की पिछली दीवार से केवल छोटे-मोटे सामान ही नहीं, बल्कि बीड़ी, गुड़ाखू, गुटखा, सिगरेट,शराब, गांजा और मोबाइल फोन तक पहुंचाए जाने की बातें सामने आती रही हैं।
यदि इन दावों में तथ्य सामने आते हैं तो मामला केवल जेल के अंदर मोबाइल मिलने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह जेल के बाहर और अंदर सक्रिय कथित नेटवर्क की जांच का विषय बन सकता है।
मुलाकात कक्ष में तय होता है कथित ‘प्लान’?
जेल में बंदियों से मुलाकात का निर्धारित समय सुबह करीब 9:30 बजे से दोपहर 1:30 बजे तक बताया जाता है।
यही वह समय है जब बंदियों की मुलाकात उनके परिजनों या परिचितों से होती है। आरोप है कि इसी दौरान बाहर मौजूद लोगों के साथ कथित तौर पर समय और स्थान तय किए जाते हैं।इसके बाद जेल के पीछे की दीवार के आसपास पहुंचकर सामान फेंकने की कोशिश किए जाने की बात कही जा रही है।
हालांकि इस कथित व्यवस्था की पुष्टि आधिकारिक जांच के जरिए किया जाना बाकी है।
शाम ढलते ही जेल के पीछे बढ़ती है आवाजाही?
स्थानीय लोगों के अनुसार शाम के समय जेल की पिछली दीवार के आसपास संदिग्ध गतिविधियां बढ़ने की बात कही जाती है।आरोप है कि अंधेरे का फायदा उठाकर कुछ लोग दीवार के आसपास पहुंचते हैं और मौका देखकर सामान अंदर फेंकने का प्रयास करते हैं।
यदि ऐसा है…
आखिर उस वक्त अस्पताल में कौन-कौन मौजूद था?
किस बंदी की तबीयत खराब हुई थी?
ड्यूटी पर कौन कर्मचारी तैनात था?
सीसीटीवी कैमरों में उस समय की गतिविधियां क्या रिकॉर्ड हुईं?
और सबसे अहम—क्या उसी दौरान मोबाइल का इस्तेमाल हुआ?
इन सवालों का जवाब जांच में सामने आना बाकी है।
अमित नाम की चर्चा ने बढ़ाया रहस्य
दो मोबाइल मिलने के बाद जेल के अंदर और बाहर ‘अमित’ नाम की चर्चा होने की बात भी सामने आ रही है, सूत्रों के हवाले से कई तरह की बातें कही जा रही हैं, लेकिन अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि कथित अमित का इन मोबाइलों से वास्तविक संबंध क्या है।
यही वजह है कि मामले में किसी व्यक्ति का नाम निश्चित रूप से जोड़ने से पहले पुलिस जांच और आधिकारिक पुष्टि बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
यदि कॉल डिटेल, सिम की केवाईसी, मोबाइल का तकनीकी विश्लेषण और सीसीटीवी फुटेज सामने आते हैं, तो यह पता लगाया जा सकता है कि मोबाइल का इस्तेमाल कौन कर रहा था और उसके संपर्क किन लोगों से थे।
आखिर सिम किसके नाम पर थी?
पूरे मामले की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी सिम कार्ड मानी जा रही है।
दोनों मोबाइल में लगी सिम किसके नाम पर थी?
सिम कब एक्टिवेट हुई?
किस दस्तावेज के आधार पर जारी हुई?
मोबाइल से किन नंबरों पर कॉल हुई?
कितनी देर तक बातचीत हुई?
क्या जेल के बाहर मौजूद किसी व्यक्ति से संपर्क हुआ?
यदि इन सवालों के जवाब सामने आते हैं तो मोबाइल जेल के भीतर पहुंचने की पूरी कड़ी खुल सकती है।
लेकिन कई दिन गुजरने के बाद भी सिम के वास्तविक उपयोगकर्ता को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं होने की चर्चा अब सवाल खड़े कर रही है।
21 फीट की दीवार और ‘टमाटर-पारले जी’ का कथित कोड
जेल के पिछले हिस्से की करीब 21 फीट ऊंची दीवार इस पूरे मामले की एक अहम कड़ी बताई जा रही है।स्थानीय लोगों और सूत्रों के अनुसार, जेल में बंद कुछ लोग मुलाकात के दौरान अपने परिचितों को कथित तौर पर समय और स्थान की जानकारी देते हैं।इसके बाद जेल के पीछे की दीवार के बाहर सामान लेकर पहुंचने की बात कही जाती है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह बताई जा रही है कि ‘टमाटर’ और ‘पारले बिस्किट’
तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि जेल के पीछे के हिस्से में निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी है?
क्या वहां अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात रहता है?
क्या रात में नियमित गश्त होती है?
क्या सीसीटीवी कैमरों की फुटेज की नियमित समीक्षा की जाती है?
जेल प्रबंधन ने भी नशीली सामग्री फेंके जाने की घटनाएं मानीं
जेल अधीक्षक जीएस शौरी के हवाले से सामने आई जानकारी के अनुसार जेल के पीछे की दीवार से नशीली सामग्री अंदर फेंके जाने की घटनाएं सामने आती रही हैं।
जेल प्रबंधन के अनुसार कई बार सुरक्षा प्रहरियों की नजर में बंदी आ जाते हैं और कुछ मामलों में नशे की सामग्री के साथ उन्हें पकड़ा भी गया है।बताया गया है कि हर महीने करीब 12 से 15 मामलों में नशीली सामग्री जब्त कर नष्ट किए जाने की कार्रवाई होती है।संबंधित बंदी को दूसरे बैरक में भेजने तथा उसके परिवार या परिचितों से कुछ अवधि के लिए मुलाकात प्रतिबंधित करने जैसी कार्रवाई किए जाने की बात भी सामने आई है।
पहले भी कैमरे में कैद हो चुका है सामान फेंकने वाला
जेल प्रबंधन के अनुसार करीब दो महीने पहले दिन के समय एक युवक को जेल के भीतर सामान फेंकते हुए कैमरे में कैद किया गया था।
सीसीटीवी फुटेज के आधार पर जुटमिल पुलिस द्वारा कार्रवाई कर युवक को जेल भेजे जाने की जानकारी भी सामने आई है।
ऐसे में अब दो मोबाइल मिलने के बाद यह सवाल और महत्वपूर्ण हो गया है कि क्या दोनों मोबाइल भी इसी तरह किसी बाहरी नेटवर्क के जरिए जेल के भीतर पहुंचे?
जिम्मेदारी किसकी और जवाबदेही कब?
जेल में मोबाइल मिलना सिर्फ एक फोन मिलने की घटना नहीं है। यह जेल की सुरक्षा व्यवस्था की कई परतों से जुड़ा सवाल है।
अगर मोबाइल बाहर से अंदर पहुंचा तो सुरक्षा जांच में चूक कहां हुई?
अगर किसी बंदी ने मोबाइल मंगाया तो उसे किस बाहरी व्यक्ति ने उपलब्ध कराया?
अगर मोबाइल अंदर किसी कर्मचारी या मुलाकाती की मदद से पहुंचा तो वह कौन था?
और यदि दीवार के बाहर से सामान फेंका गया तो 21 फीट ऊंची दीवार और सीसीटीवी निगरानी के बावजूद यह कैसे संभव हुआ?
अब जांच के नतीजे पर टिकी नजर
फिलहाल पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण कड़ियां हैं—दो मोबाइल, सिम कार्ड, कॉल डिटेल, सीसीटीवी फुटेज, जेल अस्पताल की 15 तारीख की रात की गतिविधियां और जेल के पीछे की दीवार।
इन सभी बिंदुओं को जोड़कर जांच की जाती है तो यह साफ हो सकता है कि मोबाइल जेल के अंदर किस रास्ते से पहुंचे और इसके पीछे कौन लोग थे।
वहीं ‘अमित’ नाम को लेकर चल रही चर्चाओं की भी सत्यता जांच के बाद ही स्पष्ट होगी।
अब देखना यह है कि जांच केवल दो मोबाइल की बरामदगी और संबंधित बंदियों तक सीमित रहती है या फिर जेल के अंदर प्रतिबंधित सामान पहुंचाने वाले पूरे कथित नेटवर्क तक पहुंचती है।
फिलहाल सवाल कई हैं, लेकिन जवाब जांच के बाद ही सामने आएंगे।
अंत में तीन सवाल…
१, सैमसंग एंड्राइड फोन में किसके नाम का सिम डला हुआ था?
२, आखिर इस मामले को क्यों दबाया जा रहा है?
३,15 तारीख की रात किस बंदी की तबीयत खराब हुई थी..जहां जिला जेल के अस्पताल बैरक में ले जाया गया था,तब खुला मोबाइल का राज?
