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छत्तीसगढ़ के रायगढ़ और सरगुजा में कोयला खदान के विरोध में ग्रामीणों का गुस्सा सामने आ चुका है। इन दोनों जिलों के बाद अब कोरबा में भी नये कोयला खदान के विरोध में ग्रामीण लामबंद हो रहे है। पोड़ी-उपरोड़ा ब्लाॅक में विजय सेंट्रल कोल ब्लाॅक के विरोध में 13 गांव के ग्रामीण लामबंद हो गये है। जिसे लेकर गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के बैनर तले ग्राम पुटीपखना में महापंचायत का आयोजन किया।और सामूहिक रूप से ग्रामीणों ने विजय सेंट्रल कोल माइंस का विरोध किया है।

गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ की उर्जाधानी में कोरबा जिले में दुनिया की सबसे बड़ी कोयला खदाने संचालित है। एसईसीएल की इन खदानों ने कोयला उत्पादन के क्षेत्र में जहां नये कीर्तिमान गढ़े है।वहीं दूसरी तरफ इन्ही खदानों से आज जिले के आदिवासी और संरक्षित जनजाति नारकीय जीवन जीने को मजबूर है।

इन सारी समस्याओं के बीच केंद्र सरकार ने कामर्शियल माइंनिंग के तहत पोड़ी-उपरोड़ा ब्लाॅक में विजय सेंट्रल कोल ब्लाॅक का आबंटन रूंगटा संस कंपनी लिमिटेड को सौंपा गया है।जिसे लेकर स्थानीय ग्रामीण अभी से आंदोलन के मूड में नजर आ रहे है। कोयला खदान के विरोध में शुक्रवार को पुटीपखना गांव में महापंचायत का आयोजन किया गया था। इस महापंचायत का नेतृत्व विधायक तुलेश्वर मरकाम ने किया और बैठक में शामिल।

13 गांव के लोगों से क्षेत्र की ज्वलंत समस्याओं को लेकर रणनीति तैयार किया गया।इस महापंचायत के बाद ग्रामीणों ने कोयला खदान का विरोध करते हुए राष्ट्रपति के नाम एसडीएम को ज्ञापन सौंपा गया।
SECL की विजय वेस्ट और रानी अटारी माइंस से ग्रामीण त्रस्त
पोड़ी-उपरोड़ा ब्लाॅक में विजय सेंट्रल कोल ब्लाॅक के विरोध में एकजुट ग्रामीण पहले ही एसईसीएल की भूमिगत खदान से हलाकान है। इस क्षेत्र में एसईसीएल की विजय वेस्ट और रानी अटारी भूमिगत खदान संचालित है।
जब ये दोनों खदान खोले गये तब एसईसीएल प्रबंधन ने प्रभावित गांवों को गोद लेकर रोजगार, स्वास्थ्य सुविधा, शिक्षा के साथ ही बुनियादी सुविधा प्रदान करने का वादा किया था।लेकिन खदान संचालित होने के बाद प्रबंधन ने इन प्रभावित ग्रामीणों की गांव की तरफ मुड़कर देखना भी जरूरी नही समझा।

ग्रामीणों का आरोप है कि दोनों खदान ने उनके गांव को गोद तो लिया, लेकिन सीएसआर मद से विकास कार्य चिरमिरी और कोरिया जिले में कराया जाता है। खदान से निकलने वाले जहरीले पानी से आज स्थानीय ग्रामीणों के खेत बर्बाद हो गये है। लेकिन कभी भी इसका मुआवजा उन्हे नही मिला।

ग्रामीणों की इस तकलीफ की तरफ आज तलक ना तो SECL प्रबंधन की नजर गयी और ना ही जिला प्रशासन और राजनेताओं की। जिसका खामियाजा सालों से आज भी इस क्षेत्र में रहने वाले आदिवासी परिवार भुगत रहे है। यहीं वजह है कि इस क्षेत्र के ग्रामीण अब तीसरे कोयला खदान को लेकर लगातार विरोध में लामबंद हो गये है।
