रायगढ़ शहर व जिले की छोटी-बड़ी खबरों के लिए संपर्क करें~98279-50350
मूल खसरा नंबर 251 का एक हिस्सा अब भी शासकीय भूमि के रूप में दर्ज; मौके पर 3 जेसीबी, 5 ट्रैक्टर और एक हाईवा मिले, पेड़ कटाई की अनुमति को लेकर जांच की जरूरत
रायगढ़ (न्यूज़ मिर्ची)। जमीन की रजिस्ट्री हो गई, डायवर्सन भी हो गया, चारों ओर घेराव भी कर दिया गया, लेकिन जब उसी जमीन पर पेड़ों की कटाई और बड़े पैमाने पर खुदाई का मामला सामने आया तो कई गंभीर सवाल खड़े हो गए। रायगढ़ तहसील के ग्राम संबलपुरी में पूजा ढाबा के पास स्थित जमीन पर चल रहे समतलीकरण के काम ने भूमि के स्वामित्व, मूल आवंटन और आवश्यक अनुमतियों को लेकर चर्चा तेज कर दी है। मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि जब पेड़ों की कटाई की अनुमति मिलने की जानकारी सामने नहीं आई है, तो आखिर इस काम को किस आधार पर अंजाम दिया गया?
वन प्रबंधन समिति संबलपुरी के अध्यक्ष शौकी लाल निषाद ने 17 सितंबर को एसडीएम रायगढ़ से शिकायत कर जमीन पर हो रही खुदाई और पेड़ों की कटाई की जांच की मांग की थी। शिकायत के करीब एक महीने बाद एसडीएम के निर्देश पर गुरुवार को नायब तहसीलदार ने मौके पर पहुंचकर जांच की। जांच के दौरान तीन जेसीबी, पांच ट्रैक्टर और एक हाईवा काम में लगे पाए गए। मौके पर मिट्टी की खुदाई और जमीन को समतल करने की गतिविधियां जारी थीं।
सात एकड़ जमीन पर खुदाई, पेड़ों की कटाई किसकी अनुमति से?
संबलपुरी में पूजा ढाबा के पास पेड़ों से भरी जमीन पर मशीनों से काम किए जाने की शिकायत ने कई सवाल खड़े किए हैं। शिकायत के मुताबिक, जमीन पर पेड़ों की कटाई की गई और लगभग 10 से 15 फीट तक गहरी खुदाई की गई। इतने बड़े स्तर पर मशीनों की तैनाती और मिट्टी हटाने के काम के बीच यह जानना जरूरी है कि संबंधित गतिविधियों के लिए कौन-कौन सी अनुमतियां ली गई थीं।
राजस्व विभाग की टीम ने मौके पर खसरा नंबर 251/2, 251/3, 251/4 और 252/2 की भूमि पर काम होता पाया। इन खसरों का कुल रकबा 2.629 हेक्टेयर बताया गया है। हालांकि, पूरे क्षेत्र को करीब सात एकड़ का बताया जा रहा है। वास्तविक क्षेत्रफल और मौके पर चल रहे काम की सीमा का दस्तावेजों से मिलान किया जाना जरूरी है।
मामले में पेड़ कटाई की अनुमति नहीं मिलने की जानकारी सामने आई है।

अब जांच का महत्वपूर्ण बिंदु यह होगा कि पेड़ किस प्रकृति के थे, कटाई के लिए कौन-सी अनुमति आवश्यक थी और संबंधित विभागों से कोई स्वीकृति ली गई थी या नहीं।
रजिस्ट्री और डायवर्सन के बाद भी सवाल बरकरार
जमीन के चारों ओर प्रीफैब्रिकेटेड बाउंड्री से घेराव किए जाने की जानकारी है। स्थानीय सूत्रों के मुताबिक जमीन बालाजी बिल्डर्स से जुड़ी है और दीपक का नाम भी सामने आ रहा है!मौके पर मौजूद प्रज्ज्वल और कमलेश ने जमीन को निजी बताया।
प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, संबंधित जमीन राजस्व रिकॉर्ड में निजी नाम पर दर्ज है और उसका डायवर्सन भी किया जा चुका है।लेकिन यहां सबसे जरूरी बात यह है कि रजिस्ट्री या डायवर्सन अपने आप पेड़ों की कटाई की अनुमति का प्रमाण नहीं होते।जमीन पर किस तरह का काम किया जा सकता है, यह संबंधित कानूनों, भूमि की स्थिति और आवश्यक स्वीकृतियों पर निर्भर करता है।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या मौके पर किए जा रहे काम के लिए जरूरी दस्तावेज और अनुमतियां उपलब्ध थीं?

क्या पेड़ कटाई के संबंध में वन विभाग या सक्षम अधिकारी की स्वीकृति ली गई थी?
इन सवालों का जवाब दस्तावेजों की जांच के बाद ही स्पष्ट होगा।
मूल खसरा नंबर 251 का एक हिस्सा सरकारी भूमि के रूप में दर्ज
इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू मूल खसरा नंबर 251 से जुड़ा राजस्व रिकॉर्ड है।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, मूल खसरे के पांच हिस्से किए गए हैं। इनमें खसरा नंबर 251/1, जिसका रकबा 1.505 हेक्टेयर बताया गया है, अब भी शासकीय भूमि के रूप में दर्ज है।
वहीं, खसरा नंबर 251/2, 251/3, 251/4 और 251/5 को निजी व्यपवर्तित भूमि के रूप में दर्ज किए जाने की जानकारी दी गई है।

इस स्थिति में केवल रिकॉर्ड की वर्तमान प्रविष्टियों को देखकर पूरे मामले पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
मूल आवंटन आदेश, भूमि हस्तांतरण के दस्तावेज, नामांतरण, रजिस्ट्री और डायवर्सन के रिकॉर्ड की क्रमवार जांच आवश्यक है।
यदि जमीन का कोई हिस्सा कभी शासकीय भूमि के रूप में दर्ज रहा है, तो यह पता लगाना जरूरी है कि बाद के हिस्सों का स्वामित्व किस प्रक्रिया से निर्धारित हुआ।

क्या भूमि का आवंटन हुआ था? यदि हुआ, तो किस आदेश के तहत?
क्या संबंधित दस्तावेजों में सभी खसरों का स्पष्ट उल्लेख है?इन बिंदुओं पर जांच से ही स्थिति साफ हो सकेगी।
शिकायत के बाद जांच, अब आगे क्या होगी कार्रवाई?
वन प्रबंधन समिति के अध्यक्ष की शिकायत के बाद राजस्व विभाग की टीम मौके पर पहुंची और मशीनों से चल रहे काम की स्थिति देखी। लेकिन मामले का समाधान केवल मौके का निरीक्षण करने से नहीं होगा।

इसके लिए भूमि के स्वामित्व, मूल आवंटन, पेड़ कटाई की अनुमति और मिट्टी की खुदाई से संबंधित नियमों की भी जांच करनी होगी।
अब निगाहें इस बात पर हैं कि राजस्व विभाग मूल खसरे और उसके विभाजित हिस्सों के रिकॉर्ड की कितनी गहराई से जांच करता है।साथ ही, संबंधित विभाग पेड़ कटाई और जमीन पर चल रहे कार्यों के संबंध में उपलब्ध अनुमतियों का परीक्षण करते हैं या नहीं।
संबलपुरी का यह मामला अब कई सीधे सवाल सामने रखता है—जमीन का मूल आवंटन किस आधार पर हुआ?
पेड़ों की कटाई के लिए अनुमति ली गई थी या नहीं? और सरकारी दर्ज वाले मूल खसरे से जुड़े सभी हिस्सों का राजस्व रिकॉर्ड क्या कहता है?
इन सवालों के जवाब जांच और दस्तावेजों के सत्यापन के बाद ही सामने आएंगे।फिलहाल, मामले में निष्पक्ष जांच और संबंधित रिकॉर्ड की पारदर्शी पड़ताल जरूरी है,
ताकि भूमि की वास्तविक स्थिति और नियमों के पालन को लेकर स्थिति स्पष्ट हो सके!!
