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केलो नदी में जहर घोल रहा शिव शक्ति स्टील प्लांट! बाउंड्री के बाहर बहता काला पानी, आखिर कब जागेंगे जिम्मेदार?

औद्योगिक प्रदूषण की आशंका से घिरी केलो नदी, काले पानी का स्रोत क्या? पर्यावरण विभाग की निगरानी पर उठे सवाल
रायगढ़। रायगढ़ की पहचान, यहां की प्राकृतिक धरोहर और जनजीवन से जुड़ी केलो नदी की सुरक्षा को लेकर एक गंभीर सवाल खड़ा हो रहा है। शिव शक्ति स्टील प्लांट की बाउंड्री के बाहर बहते काले पानी को लेकर यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर इस पानी का स्रोत क्या है?क्या यह सामान्य जल निकासी है या इसके पीछे औद्योगिक अपशिष्ट का मामला छिपा है? यदि पानी औद्योगिक गतिविधियों से निकल रहा है, तो क्या उसका समुचित उपचार किया जा रहा है?

इन सवालों का जवाब अब केवल से नहीं, बल्कि मौके की जांच और वैज्ञानिक रिपोर्ट से मिलना चाहिए।
औद्योगिक विकास जरूरी है, लेकिन क्या इसकी कीमत नदियों और पर्यावरण को चुकानी पड़ेगी? उद्योगों के संचालन के साथ पर्यावरणीय नियमों का पालन भी उतना ही अनिवार्य है। ऐसे में प्लांट की बाउंड्री के बाहर काला पानी बहने की स्थिति को सामान्य मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह मामला जांच की मांग करता है, क्योंकि पानी का रंग देखकर ही उसकी वास्तविक गुणवत्ता या विषाक्तता तय नहीं की जा सकती।

बाउंड्री के बाहर काला पानी, आखिर निकल कहां से रहा है?
किसी भी औद्योगिक इकाई के आसपास पानी का असामान्य रंग दिखाई देना अपने आप में पड़ताल का विषय है। सबसे पहले यह पता लगाया जाना चाहिए कि पानी किस नाली, पाइपलाइन या निकासी मार्ग से बाहर आ रहा है।क्या उसका संबंध प्लांट की उत्पादन प्रक्रिया से है?

क्या वहां औद्योगिक अपशिष्ट के उपचार की व्यवस्था है?
क्या पानी को निर्धारित मानकों के अनुरूप साफ करने के बाद ही बाहर छोड़ा जा रहा है?
यदि पानी का संबंध औद्योगिक गतिविधियों से पाया जाता है, तो उसकी गुणवत्ता की जांच और निकासी व्यवस्था का निरीक्षण बेहद जरूरी हो जाता है। प्रशासन को केवल बाहर दिखाई दे रहे पानी तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसके स्रोत से लेकर आगे के बहाव मार्ग तक पूरी जांच करनी चाहिए।

केलो नदी पर खतरे की आशंका, लापरवाही की गुंजाइश नहीं
नदियां केवल जलधारा नहीं, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन का महत्वपूर्ण हिस्सा होती हैं। यदि किसी औद्योगिक इकाई से निकलने वाला दूषित पानी नदी तक पहुंचता है, तो उससे जलीय जीवों, आसपास की मिट्टी और जल की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका रहती है। वास्तविक नुकसान कितना है, यह वैज्ञानिक जांच से ही स्पष्ट होगा।

केलो नदी में प्रदूषण की आशंका को गंभीरता से लेते हुए यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि किसी भी प्रकार का अनुपचारित औद्योगिक अपशिष्ट नदी में न पहुंचे। यदि जांच में प्रदूषण की पुष्टि होती है, तो उसके स्रोत की पहचान कर तत्काल सुधारात्मक कदम उठाए जाने चाहिए।
पर्यावरण विभाग की निगरानी आखिर कितनी प्रभावी?
इस पूरे मामले में छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल और जिला प्रशासन की भूमिका महत्वपूर्ण है। संबंधित अधिकारियों को मौके पर जाकर निरीक्षण करना चाहिए और पानी के नमूने लेकर मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला में परीक्षण कराना चाहिए। पानी में मौजूद संभावित प्रदूषकों, पीएच स्तर और अन्य जरूरी मानकों की जांच से ही वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है।

इसके साथ ही प्लांट की जल उपचार व्यवस्था, अपशिष्ट निकासी के रास्ते, आवश्यक अनुमतियों और पर्यावरणीय मानकों के अनुपालन की पड़ताल होनी चाहिए। यदि नियमों का उल्लंघन मिलता है, तो नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। जांच का उद्देश्य केवल औपचारिकता निभाना नहीं, बल्कि प्रदूषण की आशंका को दूर करना और भविष्य में ऐसी स्थिति रोकना होना चाहिए।

जनता को जवाब चाहिए, केवल कागजी कार्रवाई नहीं!
सबसे बड़ा सवाल यही है कि बाउंड्री के बाहर बह रहे काले पानी की वास्तविकता क्या है? क्या संबंधित विभाग इसकी जांच करेंगे? क्या पानी के नमूनों की रिपोर्ट सार्वजनिक की जाएगी? क्या प्लांट की निकासी व्यवस्था की पड़ताल होगी? और यदि औद्योगिक प्रदूषण की पुष्टि होती है, तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी?

इन सवालों को अनदेखा करने से संदेह और गहरा होगा। पारदर्शी जांच से ही स्थिति स्पष्ट हो सकती है और यदि कोई उल्लंघन नहीं है, तो संबंधित पक्ष को भी अपनी स्थिति तथ्यों के साथ सामने रखने का अवसर मिलेगा।

पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी का नहीं। केलो नदी की सुरक्षा से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं होना चाहिए। शिव शक्ति स्टील प्लांट की बाउंड्री के बाहर बहते काले पानी के स्रोत की निष्पक्ष जांच हो, पानी की प्रयोगशाला रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए और यदि प्रदूषण या नियमों के उल्लंघन की पुष्टि हो, तो जिम्मेदारों पर नियमानुसार कार्रवाई की जाए।

अब देखना यह है कि संबंधित विभाग इस गंभीर सवाल पर कितनी तत्परता दिखाते हैं। केलो नदी को स्वच्छ और सुरक्षित रखने के लिए कार्रवाई समय पर होनी चाहिए—क्योंकि पर्यावरण को होने वाला नुकसान बाद में केवल बयान जारी करने से नहीं सुधरता।



