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दिन में आम जनता सड़कों पर फ्लाई ऐश(राख)फांक रही है,
और शाम होते ही ज़िम्मेदार लोग जाम छलका रहे हैं!!
रायगढ़।जिस रायगढ़ को कभी ‘सुग्घर रायगढ़’ कहा जाता था, आज वही शहर फ्लाई ऐश और ज़हरीली धूल के साए में दम तोड़ रहा है। शहर और आसपास के औद्योगिक इलाकों में हालात ऐसे हैं कि आम नागरिक दिनभर सड़कों पर उड़ती राख और धूल सांसों में भरने को मजबूर है, लेकिन इस गंभीर समस्या पर ज़िम्मेदारों की चुप्पी सवालों के घेरे में है।
🔥 दिन में जनता के फेफड़ों में राख, रात में रसूखदारों की ‘इनर बॉडी सर्विसिंग’
शहर के कई इलाकों में कोयला परिवहन, फ्लाई ऐश डंपिंग और भारी वाहनों की आवाजाही से हालात बदतर हो चुके हैं।
स्कूल जाने वाले बच्चे
बुज़ुर्ग,दमा व सांस के मरीज
सबसे ज़्यादा प्रभावित हैं।
दिन में आम जनता ज़हरीली हवा से जूझती है, वहीं शाम ढलते ही सिस्टम से जुड़े लोग निजी महफ़िलों और ‘लिक्विड ऑक्सीजन’ (🍻) की सर्विसिंग में व्यस्त दिखाई देते हैं।
जब गला तर और जेब गरम हो, तो बाहर उड़ती राख भला किसे नज़र आए?
☠️ राख डंपिंग से बंजर होती ज़मीन, उजड़ता भविष्य
फ्लाई ऐश के अवैध और अनियंत्रित डंपिंग ने रायगढ़ की खेती योग्य ज़मीन को भी गंभीर नुकसान पहुँचाया है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि:
खेतों की उपज घट रही है
ज़मीन की उर्वरता खत्म हो रही है~पीने के पानी पर भी असर पड़ रहा है~इसके बावजूद न तो सख़्त निगरानी है, न ही दोषियों पर ठोस कार्रवाई। सवाल यह है कि क्या पर्यावरण नियम सिर्फ काग़ज़ों तक ही सीमित हैं?
🤐 ज़िम्मेदार मौन, जनता बेहाल — जवाबदेही कब?
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि प्रशासनिक स्तर पर कोई ठोस जवाब सामने नहीं आ रहा।ना नियमित मॉनिटरिंग की जानकारी सार्वजनिक होती है,
ना ही प्रदूषण फैलाने वालों पर कार्रवाई की स्पष्ट रिपोर्ट।
जनता पूछ रही है—
“जब हमें सांस लेने के लिए शुद्ध हवा नहीं मिल रही,
तो क्या यह मान लिया जाए कि ‘एक था रायगढ़’ ही आने वाला सच है?”
❓शुद्ध ऑक्सीजन कहाँ है साहब?
आज रायगढ़ में आम नागरिक के लिए शुद्ध हवा सपना बनती जा रही है।व्यंग्य यह है कि शुद्ध ‘ऑक्सीजन’ अगर कहीं मिल रही है,
तो वो सिर्फ ग्लास के भीतर 🥃 दिखाई देती है—
सड़कों पर नहीं, सांसों में नहीं।
अब सवाल साफ है—
क्या प्रशासन जागेगा, या रायगढ़ की काली हवा ही आने वाली पीढ़ियों की विरासत बनेगी????

