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रायगढ़।पांच साल पुराने एक चर्चित और संवेदनशील मामले में आखिरकार न्याय की किरण दिखाई दी है। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी न्यायालय ने सख्त रुख अपनाते हुए भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) में पदस्थ प्रधान आरक्षक मुकेश त्रिपाठी और उनकी पत्नी पूनम त्रिपाठी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश जारी किए हैं। अदालत के इस फैसले को न्याय व्यवस्था में आम नागरिकों के भरोसे को मजबूत करने वाला माना जा रहा है।

क्या है पूरा मामला?
यह मामला वर्ष 2020 का है। परिवादिनी मंजु अग्रवाल अपने पति को घर बुलाने के उद्देश्य से कोतरा रोड स्थित सावित्री नगर में आरोपी के निवास पर पहुंची थीं।
आरोप है कि इसी दौरान प्रधान आरक्षक मुकेश त्रिपाठी और उनकी पत्नी पूनम त्रिपाठी ने महिला के साथ अभद्र व्यवहार करते हुए:
अश्लील गाली-गलौच की
सार्वजनिक रूप से अपमानित किया,गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी इस घटना से आहत महिला ने तत्काल इसकी शिकायत भी दर्ज कराई थी।
उल्टा पीड़िता पर ही दर्ज कराया केस!
मामले में सबसे गंभीर पहलू यह सामने आया कि घटना के बाद आरोपी मुकेश त्रिपाठी ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए उसी दिन सिटी कोतवाली में परिवादिनी के खिलाफ ही विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज करा दिया।
पीड़िता का आरोप है कि इसके बाद भी:
उसे लगातार धमकाया गया
मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया दबाव बनाकर शिकायत वापस लेने की कोशिश की गई
पुलिस कार्रवाई पर उठे सवाल
महिला द्वारा सिटी कोतवाली में लिखित शिकायत देने के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। इससे पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े हुए।न्याय न मिलने से परेशान होकर अंततः पीड़िता ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और परिवाद दायर किया।
अदालत का सख्त आदेश
लंबी सुनवाई और तथ्यों के परीक्षण के बाद मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी पुनीत समीक्षा खलखो ने 12 मार्च 2026 को आदेश पारित करते हुए!!
दोनों आरोपियों के खिलाफ निम्न धाराओं में अपराध दर्ज करने के निर्देश दिए:
धारा 294 – अश्लील हरकत/गाली-गलौच
धारा 506 – आपराधिक धमकी
धारा 500 – मानहानि
धारा 511 – अपराध का प्रयास
धारा 34 – समान उद्देश्य
अगली तारीख तय
अदालत ने आरोपी प्रधान आरक्षक और उनकी पत्नी को 16 अप्रैल 2026 को न्यायालय में उपस्थित होने के निर्देश दिए हैं। अब इस मामले में आगे की सुनवाई पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।
पीड़िता की ओर से पैरवी
इस पूरे मामले में परिवादिनी की ओर से अधिवक्ता सिराजुद्दीन ने प्रभावी पैरवी की, जिसके बाद अदालत ने यह महत्वपूर्ण आदेश पारित किया।
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
पुलिस विभाग से जुड़े कर्मचारी पर कार्रवाई का आदेश
पद के दुरुपयोग पर न्यायालय का सख्त संदेश
पांच साल बाद पीड़िता को न्याय की उम्मीद पुलिस की निष्क्रियता पर अप्रत्यक्ष सवाल
यह मामला केवल एक महिला के साथ अभद्रता का नहीं, बल्कि न्याय के लिए लंबी लड़ाई का उदाहरण भी है। अदालत के इस आदेश ने यह स्पष्ट कर दिया है कि चाहे आरोपी कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, कानून से ऊपर कोई नहीं है!!
