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रायगढ़, 29 जुलाई 2026। आषाढ़ मास की पूर्णिमा पर मनाया जाने वाला गुरु पूर्णिमा का पर्व भारतीय संस्कृति में गुरु के प्रति श्रद्धा, समर्पण और कृतज्ञता का प्रतीक माना जाता है। सनातन परंपरा के अनुसार इसी दिन महर्षि वेदव्यास का अवतरण हुआ था, इसलिए इसे व्यास पूर्णिमा के रूप में भी मनाया जाता है।

इस पावन अवसर पर रायगढ़ जिले के बनोरा स्थित अघोर गुरु पीठ ट्रस्ट में श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक वातावरण के बीच गुरु-शिष्य परंपरा की अनूठी झलक देखने को मिली। देश के विभिन्न राज्यों से पहुंचे श्रद्धालुओं ने अपने गुरु पूज्य बाबा प्रियदर्शी राम जी के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए उनके आध्यात्मिक संदेशों को मानव जीवन का मार्गदर्शक बताया।
करीब तीन दशक पूर्व जब पूज्य बाबा प्रियदर्शी राम जी ने बनोरा की पावन धरती पर अपने आध्यात्मिक मिशन की शुरुआत की, तब यह क्षेत्र सामाजिक रूढ़ियों, अज्ञानता और मूलभूत सुविधाओं की कमी जैसी अनेक चुनौतियों से जूझ रहा था।

बाबा जी ने अपने तप, साधना और सेवा के माध्यम से लोगों को केवल धार्मिक आस्था से नहीं जोड़ा, बल्कि जीवन जीने की सकारात्मक दृष्टि भी प्रदान की। उनके सत्संग और प्रवचनों ने समाज में शिक्षा, संस्कार, सेवा और मानवीय मूल्यों की अलख जगाई। आज बनोरा केवल एक आश्रम नहीं, बल्कि आध्यात्मिक चेतना और सामाजिक परिवर्तन का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है।

“हर इंसान के भीतर छिपी है असीम शक्ति”
पूज्य बाबा प्रियदर्शी राम जी अपने प्रवचनों में सदैव कहते रहे कि प्रत्येक मनुष्य के भीतर असीम ऊर्जा और संभावनाएं विद्यमान हैं। आवश्यकता केवल उन्हें पहचानने और जागृत करने की है। उनका मानना है कि मनुष्य का सबसे बड़ा संघर्ष बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि अपने मन से होता है। यदि व्यक्ति अपने विचारों को सकारात्मक बनाए रखे तो जीवन की बड़ी से बड़ी कठिनाइयों का सामना सहजता से किया जा सकता है।

बाबा जी ने यह भी समझाया कि सुख और दुख बाहरी वस्तुओं में नहीं, बल्कि मन की अवस्था में निवास करते हैं। जरूरत से अधिक भौतिक संसाधनों की चाह ही अधिकांश दुखों का कारण बनती है। इसलिए संतुलित, सरल और सेवा भाव से युक्त जीवन ही वास्तविक सुख का मार्ग है।
सेवा को बताया सबसे बड़ा धर्म
पूज्य बाबा प्रियदर्शी राम जी ने हमेशा इस बात पर बल दिया कि केवल आर्थिक रूप से समृद्ध होना सफलता का मापदंड नहीं है।

वास्तविक सफलता उस व्यक्ति की है जो अपने ज्ञान, समय और संसाधनों का उपयोग पीड़ित, असहाय और जरूरतमंद लोगों की सेवा में करता है। उनके अनुसार निस्वार्थ मानव सेवा ही सच्चा धर्म है और यही आध्यात्मिक साधना का सर्वोच्च रूप भी है।
इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए अघोर गुरु पीठ ट्रस्ट वर्षों से शिक्षा, स्वास्थ्य, नशा मुक्ति, गरीबों की सहायता और सामाजिक जागरूकता जैसे अनेक क्षेत्रों में लगातार कार्य कर रहा है।

शिक्षा के साथ संस्कार देने का अभियान
अघोर गुरु पीठ ट्रस्ट के अंतर्गत संचालित अघोरेश्वर भगवान राम विद्या मंदिर के माध्यम से हजारों विद्यार्थियों को शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिला है। यहां केवल पाठ्यक्रम आधारित शिक्षा ही नहीं, बल्कि नैतिक मूल्यों, अनुशासन, संस्कार और सामाजिक जिम्मेदारी का भी प्रशिक्षण दिया जाता है।
बाबा जी का स्पष्ट संदेश रहा है कि शिक्षा केवल डिग्री प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाली दृष्टि है। उनका मानना है कि यदि शिक्षा के साथ संस्कार नहीं जुड़ते तो समाज में असंतुलन और संवेदनहीनता बढ़ती है।

नशा मुक्ति और समाज सुधार की निरंतर पहल
समाज को नशे की गिरफ्त से बाहर निकालने के उद्देश्य से अघोर गुरु पीठ ट्रस्ट द्वारा समय-समय पर नशा उन्मूलन अभियान चलाए जाते रहे हैं। इसके अलावा जरूरतमंद लोगों तक स्वास्थ्य सेवाएं, भोजन, वस्त्र और अन्य मूलभूत सुविधाएं पहुंचाने के लिए भी विभिन्न सेवा कार्यक्रम संचालित किए जाते हैं। आश्रम की विभिन्न शाखाएं मानव सेवा को अपना सर्वोच्च धर्म मानते हुए निरंतर कार्य कर रही हैं।

भूत का आध्यात्मिक संदेश
बाबा प्रियदर्शी राम जी ने अघोर परंपरा में प्रयुक्त भभूत का गहरा आध्यात्मिक अर्थ भी समझाया। उनके अनुसार भभूत केवल राख नहीं, बल्कि जीवन की नश्वरता, विनम्रता, वैराग्य और आत्मबोध का प्रतीक है। यह मनुष्य को स्मरण कराती है कि अंततः शरीर पंचतत्व में विलीन हो जाता है, इसलिए अहंकार छोड़कर सरल और सेवा भाव से जीवन जीना ही सर्वोत्तम मार्ग है।

वैचारिक कटुता के दौर में प्रेम और समरसता का संदेश
आज जब समाज वैचारिक मतभेद, सामाजिक तनाव और आपसी दूरियों जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है, ऐसे समय में बाबा प्रियदर्शी राम जी के संदेश लोगों को प्रेम, सहिष्णुता और मानवता का मार्ग दिखा रहे हैं। उनका कहना है कि जीवन में ऊंचाइयों तक पहुंचना जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण उन ऊंचाइयों पर विनम्रता और सेवा भावना के साथ टिके रहना भी है।

गुरु-शिष्य परंपरा की जीवंत मिसाल बना बनोरा
गुरु पूर्णिमा के अवसर पर बनोरा पहुंचे श्रद्धालुओं ने गुरु के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हुए कहा कि बाबा जी का आशीर्वाद उन्हें जीवन की कठिन परिस्थितियों में मानसिक शक्ति, आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच प्रदान करता है। वर्षों से गुरु-शिष्य परंपरा का निर्वहन करते हुए अघोर गुरु पीठ ट्रस्ट ने शिक्षा, संस्कार, सेवा और आध्यात्मिक जागरण की जो मिसाल कायम की है, वह समाज के लिए प्रेरणास्रोत बनी हुई है।
पूज्य बाबा प्रियदर्शी राम जी का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है—”सेवा ही धर्म है, ज्ञान ही कर्म है और मानवता ही सबसे बड़ा मार्ग है।”
गुरु पूर्णिमा के इस पावन अवसर पर श्रद्धालुओं ने पूज्य बाबा प्रियदर्शी राम जी के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन करते हुए उनके आशीर्वाद से समाज में प्रेम, समरसता और मानव सेवा की भावना निरंतर बढ़ती रहे, ऐसी कामना व्यक्त की।
