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सियासत की नई बिसात: 2028 के विधानसभा रण से पहले
टिकट की जंग तेज, पुराने समर्थकों की वापसी से बदले सियासी समीकरण
‘फैसला पार्टी करेगी’ के पर्दे के पीछे शुरू हुआ खेल,समर्थन और विरोध की खामोश राजनीति ने बढ़ाई बेचैनी
जन्मदिन के बहाने शक्ति प्रदर्शन से लेकर पैराशूट दावेदारों की दस्तक तक, टिकट की दौड़ में हर चाल पर नजर
रायगढ़।विधानसभा चुनाव की रणभेरी अभी दूर है, लेकिन रायगढ़ की सियासी बिसात पर मोहरे तेजी से चलने लगे हैं। चुनाव की तारीख भले घोषित न हुई हो, लेकिन टिकट की दौड़ ने राजनीतिक तापमान बढ़ाना शुरू कर दिया है। पुराने समर्थकों की बैठकों से लेकर नए चेहरों की सक्रियता तक, हर गतिविधि के पीछे आने वाले चुनाव की संभावनाएं तलाशने की कोशिश की जा रही है।
राजनीतिक गलियारों में इन दिनों सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि कौन चुनाव लड़ना चाहता है?

असली सवाल यह है कि कौन किसे चुनाव लड़ते देखना चाहता है और कौन किसे मैदान में उतरने से पहले ही रोक देना चाहता है?
यही वह जगह है, जहां राजनीति का सार्वजनिक चेहरा पीछे हटता है और असली सियासी गणित सामने आता है।पुराने समर्थकों की वापसी ने बढ़ाई हलचल
कट्टर और पुराने कांग्रेसी नेताओं में चुनावी सक्रियता बढ़ना, समर्थकों के साथ बैठकें करना और वर्षों पुराने राजनीतिक संपर्कों को फिर से सक्रिय करना महज सामान्य राजनीतिक गतिविधि नहीं मानी जा रही है। जन्मदिन जैसे सामाजिक अवसर भी कई बार राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन का मंच बन जाते हैं।एक साथ नजर आते पुराने समर्थक, कार्यकर्ताओं की मौजूदगी और लंबे समय बाद सक्रिय होते राजनीतिक नेटवर्क यह संकेत देते हैं कि कुछ दावेदार अभी से अपनी जमीन नापने में जुट गए हैं।

राजनीति में पुराने समर्थक केवल भीड़ नहीं होते। वे संघर्ष के दिनों की पूंजी होते हैं। वे बताते हैं कि किस चेहरे ने किस दौर में किसके साथ खड़े होकर राजनीति की थी। यही नेटवर्क चुनावी मौसम में अचानक सबसे महत्वपूर्ण हो जाता है।
लेकिन इसी के साथ एक दूसरा सवाल भी खड़ा हो रहा है—क्या वर्षों से संगठन में सक्रिय रहे चेहरों के सामने अचानक उभरने वाले नए दावेदार चुनौती बनेंगे?

‘पैराशूट’ दावेदारों की एंट्री से बढ़ी बैचेनी
रायगढ़ की राजनीति में उन चेहरों की चर्चा भी शुरू हो गई है, जो सामान्य दिनों में पार्टी संगठन या कांग्रेस कार्यालय की गतिविधियों में बहुत अधिक सक्रिय दिखाई नहीं देते, लेकिन चुनाव करीब आते ही संभावित टिकट की दौड़ में नजर आने लगते हैं।
ऐसे चेहरों को लेकर पुराने कार्यकर्ताओं के बीच स्वाभाविक सवाल उठना लाजिमी है—जो पूरे पांच साल मैदान में नहीं दिखा, क्या वह चुनाव आते ही दावेदारी में सबसे आगे खड़ा हो सकता है?
यह सवाल सिर्फ कांग्रेस तक सीमित नहीं है। लगभग हर राजनीतिक दल में चुनाव के पहले ऐसे समीकरण बनते हैं, जहां पुराने कार्यकर्ता अपनी वर्षों की मेहनत का हिसाब सामने रखते हैं और नए दावेदार अपनी सामाजिक स्वीकार्यता, व्यक्तिगत प्रभाव या दूसरे राजनीतिक समीकरणों के आधार पर टिकट की उम्मीद करते हैं।
यहीं से संगठन के भीतर असली टकराव शुरू होता है।

हालिया ऑनलाइन रिपोर्टों में भी कैलाश नायक को प्रकाश नायक के भाई के रूप में संदर्भित करते हुए भाजपा में जाने की बात सामने आई है।
विधानसभा दावेदारों के सामने नई चुनौती
वर्तमान राजनीतिक माहौल में सामाजिक समीकरणों को नजरअंदाज करना किसी भी दल के लिए आसान नहीं है। विशेषवर्ग राजनीतिक सक्रियता ने टिकट वितरण के गणित को और जटिल बना दिया है।सामाजिक प्रतिनिधित्व लोकतांत्रिक राजनीति का स्वाभाविक हिस्सा है। लेकिन सवाल तब उठता है जब सामाजिक समीकरण किसी दावेदार की राजनीतिक क्षमता को परखने के बजाय उसकी दावेदारी काटने का औजार बन जाए।किसी उम्मीदवार की वर्षों की सक्रियता पर सीधे सवाल उठाना मुश्किल होता है। ऐसे में चर्चा का रुख बदलकर सामाजिक समीकरण की तरफ कर दिया जाता है।

“जनाधार है, लेकिन समीकरण क्या कहता है?”
राजनीति में यही एक वाक्य कई मजबूत दावेदारों की राह कठिन कर सकता है।
सामान्य वर्ग के दावेदारों के सामने चुनौती इसलिए भी बढ़ती दिखाई दे रही है कि उन्हें अब केवल विपक्षी दल से नहीं, बल्कि अपने ही संगठन के भीतर मौजूद दूसरे दावेदारों और बदलते सामाजिक गणित से भी मुकाबला करना होगा।

कुछ कांग्रेसी~कांग्रेस के ही नेता को निपटाया
सबसे बड़ा खतरा सामने वाले से नहीं, बगल वाले से
राजनीतिक संघर्ष का सबसे दिलचस्प पहलू यही है कि हर विरोधी सामने खड़ा नहीं होता।
कुछ विरोध खुलकर होता है। कुछ विरोध समर्थन की भाषा में छिपा होता है।
कहीं कहा जाएगा—“फैसला तो पार्टी को करना है।”
कहीं कहा जाएगा—“हम तो सभी दावेदारों के साथ हैं।”
लेकिन इसी बीच किसी समर्थक को फोन, किसी प्रभावशाली व्यक्ति से मुलाकात, किसी बैठक में एक नाम की चर्चा और दूसरे नाम पर चुप्पी जैसे छोटे-छोटे कदम राजनीतिक वातावरण को प्रभावित करते हैं।
यही भीतर की राजनीति का सबसे महीन खेल है।
यहां किसी का नाम लेकर विरोध नहीं किया जाता। किसी के खिलाफ मंच नहीं सजाया जाता। सिर्फ माहौल बनाया जाता है।
और राजनीति में कई बार माहौल ही फैसला बदलने के लिए काफी होता है।
रायगढ़ में किसका चलेगा जादू… विधानसभा चुनाव की टिकट दिलवाले में…टीएस,भूपेश,महंत उमेश या देवेंद्र

तस्वीरों में साथ, लेकिन टिकट के वक्त कौन किसके साथ?
आज जो नेता किसी दावेदार के साथ मंच पर दिखाई दे रहा है, जरूरी नहीं कि टिकट के निर्णायक दौर में भी उसी के साथ खड़ा हो।
राजनीति में तस्वीरें बहुत कुछ बताती हैं, लेकिन सब कुछ नहीं।
कई बार शुरुआती दौर में भीड़ बड़ी होती है, समर्थकों की सूची लंबी होती है और बैठकों में उत्साह दिखाई देता है। लेकिन टिकट की वास्तविक लड़ाई शुरू होते ही समीकरण बदलने लगते हैं।इसीलिए आने वाले दिनों में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं होगा कि किस दावेदार के साथ कितने लोग हैं।यह भी देखना होगा कि निर्णायक समय पर कितने लोग उसके साथ खड़े रहते हैं।

कांग्रेस में पुराने बनाम नए की खींचतान?
कांग्रेस के भीतर लंबे समय से सक्रिय पुराने चेहरों और चुनावी मौसम में अचानक सक्रिय होने वाले नए दावेदारों के बीच संभावित टकराव आने वाले समय की महत्वपूर्ण राजनीतिक कहानी बन सकता है।
पुराने दावेदार अपनी संगठनात्मक सक्रियता, संघर्ष और जमीनी संपर्क को आधार बनाएंगे।
नए दावेदार सामाजिक समीकरण, नए मतदाताओं तक पहुंच और बदलते राजनीतिक माहौल को अपनी ताकत बताएंगे।पार्टी नेतृत्व के सामने चुनौती यही होगी कि वह जनाधार,संगठनात्मक सक्रियता,सामाजिक प्रतिनिधित्व और चुनाव जीतने की क्षमता के बीच संतुलन कैसे बैठाता है।क्योंकि टिकट किसी एक समीकरण से तय नहीं होता।लेकिन किसी एक समीकरण की अनदेखी भी राजनीतिक नुकसान का कारण बन सकती है।

टिकट की लड़ाई में सबसे कठिन परीक्षा ‘अपनों’ की
आने वाले दिनों में सामान्य दावेदारों की सबसे बड़ी परीक्षा जनता के बीच नहीं, बल्कि अपने ही संगठन के भीतर हो सकती है।उन्हें यह समझना होगा कि कौन वास्तविक समर्थक है, कौन परिस्थितिजन्य साथी और कौन सिर्फ राजनीतिक गणित के चलते साथ दिखाई दे रहा है।
क्योंकि चुनावी राजनीति में सबसे कठिन मुकाबला उस व्यक्ति से नहीं होता जो खुले तौर पर विरोध करता है।मुश्किल उस राजनीतिक संकेत को पढ़ना होता है, जहां सामने वाला मुस्कुराकर समर्थन करता है,लेकिन पर्दे के पीछे किसी दूसरे नाम को आगे बढ़ाने में लगा होता है।

यही राजनीति का वह हिस्सा है जो पोस्टर और मंच से दिखाई नहीं देता।
अब देखना होगा—किसका रास्ता खुलेगा, किसका बंद होगा
रायगढ़ में अभी चुनावी घोषणा नहीं हुई है, लेकिन टिकट की संभावित दौड़ ने राजनीतिक गतिविधियों को तेज कर दिया है।पुराने समर्थक फिर सक्रिय हो रहे हैं। नए दावेदार दस्तक दे रहे हैं। सामाजिक समीकरणों की गणित शुरू हो चुकी है। जन्मदिन और सामाजिक आयोजनों में राजनीतिक संदेश तलाशे जा रहे हैं। संगठन के भीतर संभावित टिकटों को लेकर चर्चाएं बढ़ रही हैं।
अब आने वाले समय में सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि टिकट किसे मिलता है।
सवाल यह भी होगा कि—
किसने किसका साथ दिया?
किसने किसका रास्ता रोका?
किसने किसे आगे बढ़ाया?
किसने सामाजिक समीकरण का सहारा लिया?
और किसने अपनी वर्षों की राजनीतिक जमीन को टिकट की दौड़ में ताकत में बदला?
आखिर चुनावी शतरंज में मात हमेशा सामने खड़े प्रतिद्वंद्वी से नहीं मिलती।
कई बार सबसे पहले वही मोहरा कटता है, जिसे अपने ही समझकर सबसे सुरक्षित रखा गया था।
क्योंकि चुनावी राजनीति में शुरुआती समर्थन और अंतिम राजनीतिक प्रतिबद्धता के बीच बड़ा अंतर हो सकता है।

जन्मदिन बने शक्ति प्रदर्शन का मंच?
रायगढ़ में पुराने समर्थकों के साथ जन्मदिन मनाने और राजनीतिक रूप से सक्रिय चेहरों की एकजुटता को भी इसी बदलते वातावरण से जोड़कर देखा जा रहा है।जन्मदिन व्यक्तिगत आयोजन हो सकता है, लेकिन राजनीति में जब पुराने कार्यकर्ता, समर्थक और राजनीतिक चेहरे बड़ी संख्या में एक साथ दिखाई दिए,तो वहीं सूत्रों के मुताबिक अपने आप को मजबूत दिखाने के लिए पैसों की भीड़ इकट्ठा की गई थी,और ट्रैक्टरों में भर-भर कर ग्रामीणों को लाया गया था!
ऐसे आयोजन यह बताने का माध्यम भी बन सकता हैं कि किसके पास अभी भी अपना राजनीतिक नेटवर्क मौजूद है।
और यही नेटवर्क आने वाले विधानसभा चुनाव में टिकट की दावेदारी का आधार बन सकता है?

रायगढ़ में किसका चलेगा जादू…विधानसभा चुनाव की टिकट दिलवाले में
टीएस,भूपेश,महंत उमेश या देवेंद्र….
रायगढ़ की सियासत में बिसात बिछ चुकी है। मोहरे चल पड़े हैं। अब देखना सिर्फ यह है कि अगली चाल किसकी होगी—और मात किसकी।
रायगढ़ विधायक ओपी चौधरी के सामने कौन?
१,जयंत ठेठवार
२,सलीम नियारिया
३, डॉ राजू अग्रवाल
४,महिला पूर्व जिला अध्यक्ष
५,अनिल अग्रवाल (चीकू)
६,रामचंद्र शर्मा
७,अरुण गुप्ता
८,अनिल शुक्ला
सुषमा नायक की दावेदारी पर ‘कैलाश फैक्टर’!
एक ही परिवार में बदलती सियासी निष्ठा ने बढ़ाई कांग्रेस की टेंशन, टिकट के समीकरण पर उठे सवाल
रायगढ़। विधानसभा चुनाव भले अभी दूर हों, लेकिन रायगढ़ कांग्रेस में टिकट की संभावित दौड़ ने अभी से राजनीतिक हलचल बढ़ा दी है। पूर्व विधायक प्रकाश नायक की धर्मपत्नी सुषमा नायक का नाम संभावित दावेदारों में चर्चा में आने के साथ ही अब परिवार के भीतर बदलते राजनीतिक समीकरण को भी जोड़कर देखा जाने लगा है। प्रकाश नायक 2018 में रायगढ़ से कांग्रेस के टिकट पर विधायक चुने गए थे और 2023 में भी कांग्रेस ने उन्हें प्रत्याशी बनाया था।
कैलाश नायक के भाजपा में जाने की चर्चा बनी बड़ा सवाल
राजधानी के राजनीतिक सूत्रों के हवाले से यह चर्चा सामने आई है कि प्रकाश नायक के भाई कैलाश नायक ने कांग्रेस का साथ छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया है।यही घटनाक्रम अब सुषमा नायक की संभावित दावेदारी के साथ जोड़कर देखा जा रहा है। कांग्रेस के टिकट चयन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब एक ही राजनीतिक परिवार का एक प्रमुख सदस्य भाजपा के साथ खड़ा दिखाईदे रहा हो, तो क्या इसका असर परिवार के दूसरे सदस्य की कांग्रेस से टिकट की दावेदारी पर पड़ेगा?
‘परिवार’ बनाम ‘संगठन’ की कसौटी पर होगी दावेदारी
सुषमा नायक की संभावित दावेदारी का सबसे बड़ा परीक्षण यही होगा कि कांग्रेस इसे केवल पूर्व विधायक परिवार की राजनीतिक विरासत के विस्तार के रूप में देखती है या संगठन के स्तर पर उनकी व्यक्तिगत सक्रियता, कार्यकर्ताओं से संपर्क और क्षेत्र में स्वीकार्यता को भी कसौटी बनाती है।
कांग्रेस के सामने एक तरफ प्रकाश नायक का राजनीतिक अनुभव और पूर्व विधायक के रूप में उनकी पहचान है, तो दूसरी तरफ 2023 के चुनाव में पार्टी को मिली बड़ी हार भी राजनीतिक विश्लेषण का हिस्सा रहेगी। 2023 में भाजपा के ओपी चौधरी ने रायगढ़ सीट पर 1,29,134 वोट हासिल कर जीत दर्ज की थी, जबकि प्रकाश नायक को 64,691 वोट मिले थे।
क्या भाजपा ने ‘घर’ में सेंध लगा दी?
यही वह बिंदु है जहां रायगढ़ की सियासत में ‘कैलाश फैक्टर’ महत्वपूर्ण हो जाता है। यदि कैलाश नायक का भाजपा से जुड़ना औपचारिक और सक्रिय राजनीतिक भूमिका में बदलता है, तो भाजपा इसे अपने पक्ष में राजनीतिक संदेश के तौर पर इस्तेमाल कर सकती है। वहीं कांग्रेस के सामने यह चुनौती होगी कि वह सुषमा नायक की दावेदारी को किस राजनीतिक नजरिए से देखती है।
हालांकि राजनीति में परिवार के सदस्यों की अलग-अलग राजनीतिक पसंद अपने आप में टिकट रोकने का आधार नहीं होती, लेकिन चुनावी मैदान में इसका राजनीतिक नैरेटिव जरूर बनता है। विरोधी दल इसे कांग्रेस के भीतर परिवारवाद या राजनीतिक प्रभाव के मुद्दे से जोड़ सकते हैं, जबकि कांग्रेस समर्थक इसे अलग-अलग राजनीतिक निर्णय बताकर खारिज कर सकते हैं।
टिकट की दौड़ में असली मुकाबला अब ‘नाम’ से आगे
रायगढ़ कांग्रेस में यदि सुषमा नायक का नाम गंभीरता से आगे बढ़ता है, तो मुकाबला केवल संभावित दावेदारों के बीच नहीं रहेगा, बल्कि जमीनी संगठन, कार्यकर्ताओं की स्वीकार्यता और चुनाव जिताने की क्षमता भी केंद्रीय मुद्दा बनेगी।
यानी आने वाले समय में रायगढ़ की कांग्रेस राजनीति में तीन सवाल सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होंगे—
पहला—सुषमा नायक की दावेदारी कितनी गंभीर है?
दूसरा—कैलाश नायक के भाजपा से जुड़ने का राजनीतिक असर कितना पड़ता है?
और तीसरा—कांग्रेस परिवार की राजनीतिक विरासत पर भरोसा करेगी या किसी नए जमीनी चेहरे पर दांव लगाएगी?
फिलहाल टिकट का फैसला दूर है, लेकिन इतना जरूर है कि सुषमा नायक के नाम के साथ अब ‘कैलाश फैक्टर’ जुड़ने से रायगढ़ की सियासी चर्चा और दिलचस्प हो गई है।
