रायगढ़ शहर व जिले की छोटी-बड़ी खबरों के लिए संपर्क करें~98279-50350

रायगढ़।गांव की वह जमीन, जहां वर्षों से ग्रामीण अपने परिजनों को अंतिम विदाई देते आए हैं, अब विवाद का केंद्र बन गई है।नावापारा पंचायत क्षेत्र में मुक्तिधाम की भूमि को लेकर ग्रामीणों में नाराजगी बढ़ती जा रही है। ग्रामीणों का आरोप है कि मुक्तिधाम के लिए पूर्वजों के समय से सुरक्षित बताई जाने वाली करीब तीन एकड़ भूमि पर धीरे-धीरे अतिक्रमण किया गया और अब इसका बड़ा हिस्सा कथित कब्जे की चपेट में है!ग्रामीणों के अनुसार, यह भूमि केवल अंतिम संस्कार के लिए ही नहीं बल्कि विभिन्न धार्मिक एवं सामाजिक कार्यों के लिए भी उपयोग में आती रही है। आरोप है कि समय के साथ जमीन के अलग-अलग हिस्सों में कब्जे होते गए और कई स्थानों पर निर्माण एवं बाउंड्रीवाल खड़ी कर दी गईं।इससे मुक्तिधाम के लिए उपलब्ध जमीन लगातार कम होती गई।

तीन एकड़ से महज कुछ डिसमिल जमीन बचने का दावा
ग्रामीणों का दावा है कि कभी करीब तीन एकड़ क्षेत्र में फैली मुक्तिधाम की जमीन अब सिकुड़कर बेहद कम रह गई है। कुछ ग्रामीणों का आरोप है कि वर्तमान में तीन डिसमिल के आसपास ही उपयोगी जमीन बची है,हालांकि इस दावे की आधिकारिक राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर पुष्टि अभी सामने नहीं आई है।ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते जमीन का सीमांकन और दस्तावेजों के आधार पर जांच नहीं कराई गई तो आने वाले समय में अंतिम संस्कार के लिए भी पर्याप्त स्थान उपलब्ध नहीं रहेगा।पंचायत में बैठक के दौरान बढ़ी गहमागहमी
मामले को लेकर पंचायत स्तर पर भी चर्चा और बैठक हो चुकी है। बताया जा रहा है कि पंचायत भवन में ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों के बीच मुक्तिधाम की भूमि को लेकर तीखी बहस हुई।ग्रामीणों ने कथित अतिक्रमण का मुद्दा उठाते हुए जमीन की स्थिति स्पष्ट करने और कार्रवाई की मांग की।

हालांकि ग्रामीणों का आरोप है कि पंचायत स्तर पर चर्चा के बावजूद अभी तक भूमि की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए ठोस सीमांकन या नाप-जोख नहीं कराई गई है। इसी वजह से मामला शांत होने के बजाय और अधिक गंभीर होता जा रहा है।
ग्रामीणों का सवाल—सार्वजनिक उपयोग की जमीन पर कैसे हो गया कब्जा?
ग्रामीणों का कहना है कि मुक्तिधाम जैसी सार्वजनिक उपयोग की भूमि को लेकर राजस्व रिकॉर्ड और मौके की स्थिति का मिलान कराया जाना जरूरी है। उनका सवाल है कि यदि जमीन वास्तव में मुक्तिधाम के लिए सुरक्षित है तो वहां कथित रूप से निर्माण और बाउंड्रीवाल कैसे खड़ी हुईं?
ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और राजस्व अभिलेखों के आधार पर जमीन का सीमांकन किया जाए। इसके बाद यदि किसी व्यक्ति द्वारा सरकारी या सार्वजनिक उपयोग की भूमि पर अवैध कब्जा किया जाना पाया जाता है तो नियमानुसार कार्रवाई की जाए।

अब कलेक्टर के दरबार में पहुंचेगा मामला
पंचायत स्तर पर समाधान नहीं निकलने का आरोप लगाते हुए अब ग्रामीणों ने जिला प्रशासन के समक्ष मामला रखने की तैयारी शुरू कर दी है। ग्रामीणों की ओर से कलेक्टर के नाम शिकायत पत्र तैयार किए जाने की बात सामने आई है।
शिकायत में मुक्तिधाम की भूमि की नाप-जोख, सीमांकन, राजस्व रिकॉर्ड की जांच तथा मौके की वास्तविक स्थिति की पड़ताल कराने की मांग की जाएगी। ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन मौके पर टीम भेजकर जांच कराए तो पूरे मामले की तस्वीर साफ हो सकती है।
कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन की चेतावनी
ग्रामीणों ने कहा है कि मुक्तिधाम की जमीन को लेकर यदि प्रशासन ने समय रहते संज्ञान नहीं लिया तो वे सामूहिक रूप से आगे की रणनीति तय करेंगे। ग्रामीणों के बीच कलेक्ट्रेट पहुंचकर शिकायत देने और जरूरत पड़ने पर आंदोलन करने की चर्चा भी चल रही है।
हालांकि फिलहाल ग्रामीणों की प्राथमिक मांग सीमांकन और निष्पक्ष जांच की है।उनका कहना है कि किसी व्यक्ति विशेष को निशाना बनाना उद्देश्य नहीं है, बल्कि मुक्तिधाम के लिए निर्धारित भूमि को सुरक्षित रखना और भविष्य में ग्रामीणों को अंतिम संस्कार के लिए पर्याप्त स्थान उपलब्ध कराना जरूरी है।

अब पूरे मामले में जिला प्रशासन की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। यदि प्रशासन राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर सीमांकन और स्थल जांच कराता है, तो यह स्पष्ट हो सकेगा कि मुक्तिधाम की वास्तविक भूमि कितनी है और वर्तमान में उस पर किस प्रकार का कब्जा या निर्माण मौजूद है।
नोट: मुक्तिधाम की जमीन पर अतिक्रमण, करीब तीन एकड़ भूमि के सिकुड़कर बेहद कम रह जाने और निर्माण संबंधी आरोप ग्रामीणों द्वारा लगाए गए हैं। इन दावों की आधिकारिक राजस्व जांच/सीमांकन की पुष्टि अभी सामने नहीं आई है। संबंधित पक्षों का पक्ष सामने आने पर उसे भी खबर में शामिल किया जाना उचित होगा।
