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रायगढ़।धरमजयगढ़। जिले में गौवंश तस्करी पर अंकुश लगाने के लिए चलाए जा रहे अभियान के बीच चरखापारा मवेशी बाजार और रैरुमा चौकी क्षेत्र को लेकर गंभीर आरोप सामने आ रहे हैं। स्थानीय स्तर पर लगाए जा रहे आरोपों के अनुसार, प्रत्येक सोमवार को लगने वाले चरखापारा मवेशी बाजार से बड़ी संख्या में मवेशियों को झारखंड की ओर ले जाया जाता है। आरोप यह भी है कि इस आवाजाही की आड़ में कथित रूप से गौवंश को बूचड़खानों तक पहुंचाने का नेटवर्क सक्रिय है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित मवेशियों के अंतिम गंतव्य की आधिकारिक जानकारी सामने आना बाकी है।

इस पूरे मामले ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—यदि बाजार से बड़ी संख्या में मवेशियों का परिवहन हो रहा है, तो उनके स्वामित्व, खरीद-बिक्री, परिवहन दस्तावेजों और पशु कल्याण से जुड़े नियमों की जांच किस स्तर पर की जा रही है? क्या बाजार से निकलने वाले प्रत्येक काफिले की निगरानी होती है, या फिर इस आवाजाही के बीच नियमों के उल्लंघन की आशंका को नजरअंदाज किया जा रहा है?

मामले का सबसे संवेदनशील पहलू रैरुमा चौकी क्षेत्र से मवेशियों के काफिलों के गुजरने को लेकर लगाए जा रहे आरोप हैं। स्थानीय स्तर पर दावा किया जा रहा है कि सोमवार को चरखापारा बाजार से निकलने वाले मवेशियों के समूह इसी क्षेत्र से होकर आगे बढ़ते हैं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि इन मवेशियों के परिवहन की वैधता की जांच किस तरह की जाती है।

यदि बड़ी संख्या में मवेशियों को एक स्थान से दूसरे राज्य की ओर ले जाया जा रहा है, तो उनकी खरीद-बिक्री के प्रमाण, परिवहन की अनुमति जहां लागू हो, पशुओं की संख्या और उनकी स्थिति की जांच महत्वपूर्ण हो जाती है। पशु परिवहन के दौरान निर्धारित नियमों का पालन सुनिश्चित करना भी आवश्यक है।
हालांकि, केवल किसी चौकी के सामने से मवेशियों का गुजरना अपने आप में तस्करी का प्रमाण नहीं है। लेकिन यदि स्थानीय शिकायतों में अवैध परिवहन की आशंका जताई जा रही है, तो उनकी निष्पक्ष जांच कराना संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या चरखापारा बाजार से निकलने वाले मवेशियों के काफिलों का नियमित सत्यापन किया जा रहा है? यदि जांच होती है, तो उसकी प्रक्रिया और कार्रवाई की जानकारी सार्वजनिक होने से संदेह दूर हो सकता है।

चरखापारा मवेशी बाजार से झारखंड की ओर मवेशियों को ले जाने के लिए भारतमाला सड़क मार्ग के इस्तेमाल का आरोप भी लगाया जा रहा है। स्थानीय स्तर पर यह आशंका जताई जा रही है कि इस मार्ग से मवेशियों की आवाजाही आसान होने के कारण कथित रूप से अवैध परिवहन करने वालों को सुविधा मिल सकती है।

इस मामले में यह स्पष्ट होना जरूरी है कि रैरुमा चौकी क्षेत्र में मवेशियों की आवाजाही पर किस तरह निगरानी रखी जाती है। क्या संबंधित पुलिसकर्मियों को बाजार से निकलने वाले काफिलों की जानकारी है? क्या किसी तरह की शिकायत या सूचना पहले भी मिली है? यदि मिली है, तो उस पर क्या कार्रवाई की गई?

इन सवालों के जवाब संबंधित पुलिस अधिकारियों के आधिकारिक पक्ष और जांच रिपोर्ट से ही स्पष्ट हो सकेंगे।

अब निगाहें पुलिस प्रशासन की कार्रवाई पर हैं—क्या चरखापारा मवेशी बाजार और रैरुमा चौकी क्षेत्र में मवेशियों की आवाजाही की जांच कर आरोपों की सच्चाई सामने लाई जाएगी?

फिलहाल,आगे देखना होगा कि मवेशी तस्करी पर लगाम लगेगा कि नहीं?
