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✍️न्यूज़ मिर्ची…तमनार से कुलदीप चौहान की रिपोर्ट
रायगढ़।तमनार वन परिक्षेत्र में उजागर हुआ लकड़ी तस्करी का मामला अब सिर्फ वन अपराध नहीं रहा, बल्कि यह सीधे-सीधे राजस्व प्रशासन की भूमिका और नीयत पर बड़ा सवाल बन गया है। जिस राजस्व भूमि से खैर जैसी बहुमूल्य लकड़ियों की अवैध कटाई, भंडारण और रायपुर तक तस्करी की तैयारी हुई, वह पूरे प्रशासनिक तंत्र की पोल खोलती नजर आ रही है।
कागज़ों में सेमल, ज़मीन पर खैर!
फर्जी रिकॉर्ड से खेला गया करोड़ों का खेल
प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि दस्तावेज़ों में सामान्य लकड़ी सेमल दर्शाई गई, जबकि मौके पर खैर और अन्य कीमती प्रजातियों के कटे हुए ठूंठ और लट्ठे मिले। यह स्पष्ट संकेत है कि तस्करी पूरी तरह योजनाबद्ध थी और जानबूझकर रिकॉर्ड में हेरफेर किया गया।
यह खेल एक-दो दिन का नहीं, बल्कि लंबे समय से चल रहा था,और हैरानी की बात यह कि राजस्व रिकॉर्ड और निरीक्षण व्यवस्था पूरी तरह मौन बनी रही।पटवारी–तहसीलदार क्या सो रहे थे? राजस्व अमले की चुप्पी पर गंभीर सवाल
राजस्व भूमि पर किसी भी प्रकार की कटाई या परिवहन बिना पटवारी और तहसील कार्यालय की जानकारी के होना लगभग असंभव है।
ऐसे में यह सवाल उठना लाज़मी है—क्या पटवारी ने जानबूझकर आंखें मूंद रखीं?
क्या तहसील स्तर पर मिलीभगत के चलते कार्रवाई नहीं हुई?या फिर अवैध कमाई की हिस्सेदारी ने पूरे सिस्टम को खामोश कर दिया?राजस्व अमले की यह चुप्पी अब खुद एक बड़ा संदेह बन चुकी है।
एनओसी की आड़ में तस्करी!
पंचायत से अनुमति या सिस्टम का दुरुपयोग?
मामले में पंचायत स्तर से जारी एनओसी भी संदेह के घेरे में है। सवाल यह है कि राजस्व भूमि से लकड़ी परिवहन की अनुमति किस अधिकार से दी गई?
क्या तहसील से वैधानिक अनुमति ली गई थी, या फिर नियमों को ताक पर रखकर तस्करों को खुला रास्ता दे दिया गया?
अगर एनओसी नियमविरुद्ध जारी हुई है, तो यह सिर्फ लापरवाही नहीं बल्कि सिस्टम के दुरुपयोग और साठगांठ का गंभीर मामला बनता है।
जंगल नहीं, पूरी व्यवस्था लुटी है! क्या जिम्मेदार अफसरों तक पहुंचेगी जांच?अब तक की कार्रवाई वाहन जब्ती और फरार आरोपियों की तलाश तक सीमित दिख रही है। लेकिन असली परीक्षा यह है कि—
क्या जांच सिर्फ तस्करों पर रुकेगी, या राजस्व और वन विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों तक भी पहुंचेगी?
तमनार का यह मामला साफ संदेश देता है कि अगर आज राजस्व भूमि पर लकड़ी तस्करी हो सकती है, तो कल वही ज़मीन कब्ज़े और अवैध खनन का अड्डा भी बन सकती है।
अब निगाहें जिला प्रशासन पर हैं—क्या वह सच में सख्त कार्रवाई करेगा, या यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।
