श्री सिंहदेव की ईमानदारी पर चोट,,जानिए क्या है…षड्यंत्र के पीछे का सच ….राजनीतिक की बिसात पर ईमानदारी के खिलाफ फिर से उठी उंगली….5 नवंबर 1996 को तत्कालीन कलेक्टर सरगुजा ने सिंहदेव के पक्ष में सुनाया था महत्वपूर्ण फैसला….पढ़ें न्यूज़ मिर्ची-24
भारत की आजादी के बाद जिस रियासत के विलीनीकरण पश्चात जमीनों के मालिकाना हक को लेकर श्री आलोक दुबे अम्बिकापुर का पत्र सोशल मीडिया में वायरल हो रहा है।इस पत्र के पीछे यदि ध्यान दिया जाए तो यह प्रकरण या तो राजस्व न्यायालय का है अथवा प्रतिवादी के द्वारा राजस्व न्यायालय के निर्णय से असहमत होने पर सिविल न्यायालय का है अथवा उच्च न्यायालय अथवा ग्रीन ट्रिब्यूनल का है।एक जन प्रतिनिधि ही नही वरन आज आम आदमी को भी पता होता है कि जमीन के विवाद का निपटारा करने की प्रक्रिया शाशन द्वारा निर्धारित है।ऐसी इस्थिति में ऐसा क्या कारण है कि श्री राहुल गांधी के आने की तिथि से पहले ही यह पत्र सामने आया।और मजे की बात यह है कि पत्र सीधे श्री राहुल गांधी को लिखा गया तथा प्रतिलिपि मुख्यमंत्री के साथ साथ सियासत और रियासत से जुड़े नेताओ को दिया गया।इस प्रकार यह पत्र कही किसी साजिश के तहत तो नही लिखा गया?इसके पीछे समान दल के नेताओ की प्रतिद्वंदिता ही दिखाई देती है।
हमे यह नही भूलना चाहिए कि कुछ दिन पहले इसी सरकार के विधायक बृहस्पति सिंह ने बाबा साहब पर जान से मारने की धमकी का झूठा आरोप लगाए और वो भी उस समय जब ढाई ढाई साल में मुख्यमंत्री बदलने की बात चल रही थी।उस साजिश में विधायक को माफी मांगनी पड़ी।इससे पहले भी विधायकों का परेड कराकर बाबा साहब के खिलाफ मोर्चा खोला गया ।पर जैसे जैसे यह कार्य किया गया वैसे वैसे बाबा को छबि आम जनता में बढ़ते गई।
जो पत्र आलोक दुबे द्वारा लिखा गया वह रायपुर के निर्देश पर लिखा जाना प्रतीत होता है।आखिर राहुल जी के आने से पहले ही ऐसा प्रकरण का जिन्न बोतल से बाहर कैसे आता है।उस शिकायतीं पत्र का सच कुछ अलग है।शिकायत करता जिस जमीन की बात करते है उसके संबंध में कलेक्टर सरगुजा द्वारा जांच कर अपना आदेश दिनांक 5 नवंबर 1996 को सिंहदेव के पक्ष में
सुनाया। विवादित जमीन पर 1996 में कलेक्टर का फैसला आने के बाद 25 साल बाद 2019 में आलोक दुबे द्वारा प्रकरण ग्रीन ट्रिब्यूनल में डाला गया।आखिर 25 साल बाद ऐसा क्यों हुआ?वह कौन सा मार्गदर्शक है इसनके 25 साल बाद इस जीन को बोतल से निकालने की कोशिश की।ग्रीन ट्रिब्यूनल में कलेक्टर के आदेश को दिनाक 7 मार्च 2019 के अपने आदेश में यथावत रखा गया।पर पीछे के साजिशकर्ता ने आलोक दुबे को फिर से अपील में भेज दिया।रिव्यू केस में ग्रीन ट्रिब्यूनल ने दिनाक 17 सितम्बर 2019 को विस्तृत आदेश पारित किया जिसमें कलेक्टर के आदेश को सही ठहराया गया।आखिर साजिशकर्ता ने न्यायालय के आदेशों को आम जनता के सामने क्यों नही लाया गया।
यही साजिस का प्रमाण है कि जहां पुनः ईमानदार इंसानियत के खिलाफ झूठ चिल्ला चिल्ला कर कह रहा है पर न्यायालय के आदेश सच को सच ही बता रहे है।सिर्फ बदनाम करने की साजिश वो भी राहुल गांधी जी के छतीसगढ़ प्रवास से पहले क्यों किया जा रहा है।इसका जवाब तो अंधा बिना देखे समझ सकता हैंऔर बहरा बिना सुने समझ सकता है।फिर छतीसगढ़ की आम जनता स्वयं समझ जाएगी की पुनः राजनीति गंदी तस्वीर के साथ खड़ी है क्यूंकि उत्तर प्रदेश के चुनाव के बाद कुर्सी का खेला फिर से चालू होने की संभावना है।जहाँ फिर से भ्रस्टाचार और ईमानदारी,गुंडागर्दी और विनम्रता,अहंकार और सहजता के बीच जंग देखने को मिलेगी।कलयुग में यद्यपि बुराई संगठित होकर सफलता पाने में आतुर रहती है पर सच को विलम्ब लगता है पर अंतिम जीत सच की होती है।
इस प्रकरण से सम्बंधित आवेदन पूर्व मुख्य मंत्री स्वर्गीय अजित जोगी के समय मे भी लिखा गया था।तब भी ऐसी हवा दी गई थी पर जब सच सामने आया तो टी एस बाबा को क्लीन चिट मिल गया।कहा जाता है कि राजे महाराजे द्वारा पण्डितान को दी गई जमीन को कुछ लोगो के द्वारा गलत ढंग से रजिस्ट्री करा लेने के बाद ही यह विवाद सामने आया जिसमे कोई न कोई कारण एवम विवाद है परंतु इसका निपटारा न्यायालय में ना करते हुए श्री सिंगदेव की इज्जत उतारने या कहे कि पगड़ी उतारने मात्र के लिए ऐसी शिकायते की जाती है।ऐसा प्रयास पूर्व मुख्यमंत्री डॉक्टर रमन सिंह के समय मे भी किया गया जब कि राजस्व मंत्री श्री बृजमोहन अग्रवाल और श्री प्रेम प्रकाश पांडे हुआ करते थे।उसी आवेदन का
जिन्न बोतल से फिर निकाला गया वो भी राहुल गांधी के छतीसगढ़ आने से तीन चार दिन पहले।ऐसा किया जाना एक सामान्य शिकायत न होकर बाबा साहब के ईमानदार छवि को मतीयमेट करने का मात्र प्रयास प्रतीत होता है।ऐसा किया जाना यह स्वमेव साबित करता है की अंदर खाने में सब कुछ अच्छा नही चल रहा है और उत्तर प्रदेश के चुनाव के बाद फिर से परिवर्तन का डर ही इस आवेदन के पीछे की कहानी है।
ईमानदारी पर किया गया प्रहार पिछले बीस सालों से जारी है और उसके साथ साथ बाबा साहब की ईमानदार छवि से हार जीत का फासला बढ़ता जा रहा है।बस समय समय पर सत्य और ईमानदार छवि पर हथौड़ा चलाने का काम जनता तो नहीं करती पर जनता के ही चुने हुए नुमाइंदे करते है जो उनके आस पास के प्रतिस्पर्धी होते है।इसी को कहा जाता है आस्तीन के सांप।
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श्री सिंहदेव की ईमानदारी पर चोट,,जानिए क्या है…षड्यंत्र के पीछे का सच ….राजनीतिक की बिसात पर ईमानदारी के खिलाफ फिर से उठी उंगली….5 नवंबर 1996 को तत्कालीन कलेक्टर सरगुजा ने सिंहदेव के पक्ष में सुनाया था महत्वपूर्ण फैसला….पढ़ें न्यूज़ मिर्ची-24
Santosh Kumar
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